
जज़्बा,
सपने और उम्मीदों के साथ-साथ अपने आप में एक दर्द और ख्वाब को जीने का नाम
है इरोम शर्मिला. अनशन पर बैठी इरोम को पूरे 15 साल इस बात की गवाही देते
हैं कि वो डोलने वाली नहीं हैं. आखिर ऐसा क्या है, जो उनके ख्वाबों को
प्रतिदिन सींचता रहता है, जो उन्हें हौसला देता रहता है, उनकी उम्मीदों को
एक आशा देता रहता है. आज उन्हें अपनी भूख को ज़िंदा रखे हुए 15 वर्ष हो गये
हैं. इस दौरान कई उतार-चढ़ाव आये, लेकिन इरादे बुलंद हैं और मरते दम तक
बुलंद रहेंगे.
आख़िर क्यों कर रही हैं अनशन?
मणिपुर में लगे आफ्सपा एक्ट ने हरेक स्थानीय नागरिक की ज़िंदगी को खासा
प्रभावित किया है. सेना की मनमर्जी चलती है, कहीं भी, कभी भी किसी को भी घर
से उठा लिया जाता है. बिना किसी वारंट के सेना कार्रवाई कर सकती है, लोगों
को घर से उठा लिया जाता है, कर्फयू के हवाले हो जाते हैं कई दिन, कई
रातें. यहां सेना को कुछ विशेष अधिकार दिये गये हैं, जिसके तहत वो कुछ भी
कर सकते हैं. इरोम शर्मिला इसी "कुछ भी" करने का विरोध कर रही हैं.
उन्होंने विरोध के लिए भूख हड़ताल को अपना हथियार बनाया. आज भी वो प्रयत्न
कर रही हैं. सपना रोज़ देखती हैं अपने राज्य से आफ्सपा के हटने का, लेकिन
सच कब होगा, इसका इंतज़ार उन्हें आज भी है.
कई बार पुलिस ने किया गिरफ़्तार
इस बीच इरोम चानू शर्मिला को कई बार पुलिस ने गिरफ़्तार भी किया है. कभी
उन्हें ख़ुदकुशी के मामले में पुलिस पकड़ लेती है, लेकिन एक साल से
ज़्यादा पुलिस उन्हें नहीं रख सकती अत: उन्हें रिहा कर देती है. इरोम
शर्मिला इम्फाल की एक गैर सरकारी संस्था से जुड़ कर भूख हड़ताल कर रही हैं.
इस संस्था का नाम "जस्ट पीस फाउंडेशन" है.
कई दिलासे मिले...
दरअसल सरकार किसी भी काम को मुक़म्मल करने से पहले दिलासों का सहारा
लेती है. इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ, कभी राज्य सरकार इरोम को और
राज्य के लोगों को दिलासा देती, तो कभी केंद्रीय सरकार. सरकार के इरादे
क्या हैं ये सब जानते हैं. इन 15 वर्षों में संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ
अन्य प्रतिष्ठित मानवाधिकार संस्थाओं ने इरोम का साथ दिया, लेकिन शासन की
व्यवस्था में कहीं भी, कोई भी सुधार नज़र नहीं आया.
कैसे रही इतने समय तक जीवित?
उनकी नाक में एक नली लगाई गई है जिससे उन्हें खाना दिया जाता है. कुछेक
लोगों का मानना है कि ऐसे तो कोई भी कर सकता है, ऐसा विरोध भूख हड़ताल की
श्रेणी में नहीं आता लेकिन एक बात ज़रूर याद रखें, कि अपने हाथ से, अपनी
मर्जी से खाने और जीने की आज़ादी के मायने बहुत गहरे होते हैं. इरोम
शर्मिला को सरकार द्वारा ये सब करने पर मजबूर किया जा रहा है. उनकी हिम्मत
तब तक जवाब नहीं देती जब तक सरकार अपनी जवाबदेही को पूरा नहीं करती.
स्टेट का क्या कॉन्सेप्ट है? देश किस-किस बात पर पाबंदी लगा
सकता है? इस मसले को तय करने वाले वो लोग कौन होते हैं, जो हमें आज़ाद
होने नहीं देते, न कल हमारी आज़ादी की परवाह करते . लोकतंत्र देश की
तानाशाही का आफ्सपा सबसे बड़ा उदाहरण है. मानव के अधिकारों के लिए मानव को
ही आगे आना होगा. इरोम शर्मिला ज़िंदादिली का जीता जागता सबूत हैं, एक जलती
लौ है जो बूझते सपनों को प्रेरणा देती है, आज 15 साल भूखे रहने के बाद भी.