>> हिंदू दोस्त की चिता को मुखाग्नि देकर मुस्लिम ने निभाई
कहा जाता है कि मानवता सभी धर्मों से ऊपर है। मानवता न तो किसी की जा
देखती है और न ही मजहब। एक हिंदू दोस्त जब दुनिया को अलविदा कह गया तो अब्दुल रज्जाक ने उसकी चिता को मुखाग्नि देकर अंतिम समय में भी दोस्ती निभाने का वादा टूटने नहीं दिया। यह मध्य प्रदेश की घटना है!
> हिंदू रीति रिवाज से किया अंतिम संस्कार
जिगरी दोस्त की मौत का गम और फिर अंतिम संस्कार के लिए उसके घर में कोई परिजन भी नहीं। इस पर मुस्लिम दोस्त ने धर्म, रस्म और रिवाजों से इतर दोस्ती और मानवता का धर्म निभाते हुए हिंदू दोस्त की चिता को न केवल मुखाग्नि दी बल्कि हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार किया। इस दौरान सेवाभावी संस्था ने उसकी मदद की। रविवार सुबह शहर के गंज मोक्षधाम में जिसने भी यह दृश्य देखा, वह भावविभोर हो गया। जिस-जिस को जानकारी मिली सभी ने मुस्लिम दोस्त की प्रशंसा की। मूलत: हरदा निवासी संतोष सिंह (35) मजदूरी की तलाश में नगर में आया था। वह सोनघाटी क्षेत्र में झुग्गी बनाकर रह रहा था। परिवार में उसकी पत्नी और महज 7-8 साल की एक बेटी है। कुछ दिनों से संतोष को टीवी और पीलिया की बीमारी ने घेर लिया था।
> संतोष को मुखाग्िन देने वाला कोई नहीं था
वैसे संतोष के पड़ोसी और साथ में मजदूरी करने वाले दोस्त रज्जाक खान ने संतोष का करीब एक सप्ताह तक जिला अस्पताल में उपचार कराया था, लेकिन फायदा नहीं हुआ। रविवार को उसकी की मौत हो गई। दुखद खबर मिलते ही परिवार का बुरा हाल था। ऐसे में रज्जाक और उसके परिवार ने संतोष की पत्नी और बेटी को ढांढस बंधाया। असली समस्या तब आई जब बारी दाह संस्कार की आई। संतोष का यहां ना कोई रिश्तेदार है और ना ही अन्य कोई परिचित। ऐसे में दोस्ती और मानवता का फर्ज निभाते हुए रज्जाक अपने दोस्त के अंतिम संस्कार के लिए आगे आया। रज्जाक ने मानवता को सर्वोपरि मानते हुए सभी रस्में निभाने का संकल्प लिया।
> अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं
गरीबी के चलते संतोष का परिवार अंतिम संस्कार करने में भी सक्षम नहीं था। ऐसे में लावारिश शवों का अंतिम संस्कार कराने वाली संस्था जनआस्था आगे आई। अस्पताल पुलिस चौकी से जानकारी मिलते ही जनआस्था से जुडे़ संजय शुक्ला ने तत्काल संस्था के साथियों महेश साहू, रानू हजारे सहित अन्य सहयोगियों की मदद से गंज मोक्षधाम पर अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां व अन्य सामग्री मुहैया कराई।
