>> एक ऐसा गांव जहां इंसानों की खोपड़ी को यादगार के तौर पर रखा जाता है
इन्हें कहा जाता है Head Hunters
अंग्रेजी में इन्हें 'हैड हंटर्स' कहा जाता है. पूर्वात्तर भारत के म्यांमर के दुर्गम इलाकों में ये जनजाति निवास करती है. आज ये जनजाति थोड़ी विकसित हो चुकी है. आज इन्हें शिकार का नहीं, बल्कि अफ़ीम की लत लग चुकी है. इनका मुखिया अफ़ीम खा कर पड़ा रहता है. डेलीमेल के मुताबिक इनके क़बीले के 90 फीसदी लोग अफ़ीम का सेवन करते हैं.

पूरा इलाका है युद्धग्रस्त
इस जनजाति के इलाके में नॉर्थ ईस्ट के आंतकी संगठन और सेना के बीच
लगातार संघर्ष जारी रहता है. ये इलाका युद्धग्रस्त है. गांव का नाम लोंगवा
है और यहां का हर तीसरा शख़्स अफ़ीम का लती है. एक समय था जब अपने व्यापार
का विस्तार करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के शासकों ने चीन के लोगों को
अफ़ीम की लत लगा दी थी. चीन ने युद्ध किया और इस नशे के व्यापार को बंद
करने की ठानी क्योंकि इससे चीन के युवा नकारा हो रहे थे, देश बेकारी के दौर
में पहुंच गया था. फ़िलहाल इस जनजाति का भी यही हाल है, यहां लोग नशे के
लिए अपने घरों का सामान बेच रहे हैं. परिवारजनों को खाना नहीं मिल रहा,
लेकिन नशे की लत ने सब चिंताओं से मुक्त कर मात्र नशे की दुनिया की चिंता
करने पर मजबूर कर दिया है.

ऑस्ट्रेलियन फ़ोटोगाफ़र ने खींची तस्वीरें
खोपड़ी को सहेजने वाला किस्सा सुनने के बाद ऑस्ट्रेलियन फ़ोटोग्राफ़र
राफेल कोरमन ने इस गांव का दौरा किया. साल 1960 के बाद से ही यहां हेड
हंटिंग तो बंद हो चुकी है लेकिन गांव के लोगों को नशे की हालत में देख कर
कोरमन दंग रह गये.

जो नुकसान होना था हो गया
तस्वीरों से गांव के नौजवानों और बुजुर्गों की हालत बयां हो रही है.
अंग्रेज़ों ने भारत में अफ़ीम की खेती की शुरुआत की थी. पहले 90 प्रतिशत
गांवों के लोग अफ़ीम की लत के शिकार थे लेकिन अब 30 प्रतिशत लोग ही इसकी
जकड़ में हैं. ये आंकडे डेलीमेल के हैं.देश के कोने-कोने तक नशा आसानी से उपलब्ध हो रहा है. इस नशे की जकड़ ने कई घरों के चूल्हों को बुझा दिया है. नशे के कारण परिवार टूट रहे हैं. एक नहीं बल्कि कई ज़िंदगियों को तबाह कर रहा है ये नशा. सरकार को कम खर्चे पर पुर्नस्थापना केंद्र स्थापित करने चाहिए. गलती सुधारी जा सकती है, बस लोगों की संवेदना साथ होनी चाहिए.
Source: amarujala