शरीर पर 'राम' का नाम टैटू करवा कर जातीय भेदभाव को सालों से चुनौती दे रहे हैं रामनामी
छत्तीसगढ़
भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है. यहां जातीय भेदभाव की घटनाएं
आये दिन सुनने को मिलती हैं, लेकिन एक संप्रदाय के लोग करीब 100 सालों से
इस भेदभाव के खिलाफ़ लड़ते आ रहे हैं. और इनका विरोध का तरीका बहुत ही अनूठा
है. मैं बात कर रहा हूं छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज की, जो अपने पूरे शरीर
पर राम के नाम का टैटू बनवा कर सदा के लिए भगवान श्री राम के अनुयायी बन
जाते हैं.

करीब 100 साल पहले उच्च जाति के हिन्दुओं द्वारा पिछड़ी जाति के हिन्दुओं पर हो रहे शोषण के विरोध में रामनामी संप्रदाय का गठन हुआ. पिछड़ी जाति के हिन्दुओं का मंदिरों में प्रवेश बंद कर दिया गया था, उन्हें अलग कुएं से पानी निकालना पड़ता था और ऐसी ही कई यातनाएं उन्हें झेलनी पड़ती थीं. इसके विरोध में उन्होंने अपने पूरे शरीर पर राम के नाम का टैटू गुदवाना शुरू कर दिया. रामनामी मानते हैं कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप किस जाति, संप्रदाय या सामजिक स्तर के हो, भगवान सर्वत्र है.

76 साल के राम टंडन के शरीर के टैटू सालों पड़ी धूप के कारण धुंधले से पड़ गए हैं, लेकिन वो आज भी परंपरागत वस्त्र और मुकुट पहन कर रामनामी संप्रदाय को आगे बढ़ा रहे हैं.

पास के ही गांव, गोरबा की पुनाई बाई ने 18 साल की उम्र में अपने शरीर पर राम नाम के टैटू बनवाने शुरू किये थे. 2 हफ़्तों तक चली इस प्रक्रिया में केरोसीन लैंप की राख और पानी से डाई बनाई जाती है और फिर उससे टैटू किया जाता है.

आज करीब 1,00,000 से ज़्यादा रामनामी छत्तीसगढ़ के अलग-अलग गांवों में अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. 1955 में जाति के नाम पर भेदभाव करने की प्रथा बैन होने के बाद रामनामियों की दशा कुछ सुधरी है.

राम टंडन बताते हैं कि 'नयी पीड़ी के रामनामी अपने पूरे शरीर पर राम नाम के टैटू बनवाने से थोड़ा बचते हैं. इसका मतलब ये नहीं कि उनमें श्रद्धा नहीं है. उन्हें काम और पढ़ाई के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता है और इसलिए शरीर के किसी भी अंग पर उन्हें राम नाम का टैटू बनवाना अनिवार्य है'.

रामनामी न ही मदिरा सेवन करते हैं न ही धूम्रपान. उन्हें हर दिन राम के नाम का जाप करना ज़रूरी है. हर प्राणी का आदर और सम्मान करना भी रामनामियों को सिखाया जाता है. किसी भी रामनामी के घर में आपको रामायण ज़रूर मिलेगी.

राम टंडन कहते हैं कि 'दुनिया बदल रही है, समय बदल रहा है. अब हमें एहसास हो रहा है कि हम सब एक ही हैं'.
करीब 100 साल पहले उच्च जाति के हिन्दुओं द्वारा पिछड़ी जाति के हिन्दुओं पर हो रहे शोषण के विरोध में रामनामी संप्रदाय का गठन हुआ. पिछड़ी जाति के हिन्दुओं का मंदिरों में प्रवेश बंद कर दिया गया था, उन्हें अलग कुएं से पानी निकालना पड़ता था और ऐसी ही कई यातनाएं उन्हें झेलनी पड़ती थीं. इसके विरोध में उन्होंने अपने पूरे शरीर पर राम के नाम का टैटू गुदवाना शुरू कर दिया. रामनामी मानते हैं कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप किस जाति, संप्रदाय या सामजिक स्तर के हो, भगवान सर्वत्र है.
76 साल के राम टंडन के शरीर के टैटू सालों पड़ी धूप के कारण धुंधले से पड़ गए हैं, लेकिन वो आज भी परंपरागत वस्त्र और मुकुट पहन कर रामनामी संप्रदाय को आगे बढ़ा रहे हैं.
पास के ही गांव, गोरबा की पुनाई बाई ने 18 साल की उम्र में अपने शरीर पर राम नाम के टैटू बनवाने शुरू किये थे. 2 हफ़्तों तक चली इस प्रक्रिया में केरोसीन लैंप की राख और पानी से डाई बनाई जाती है और फिर उससे टैटू किया जाता है.
आज करीब 1,00,000 से ज़्यादा रामनामी छत्तीसगढ़ के अलग-अलग गांवों में अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. 1955 में जाति के नाम पर भेदभाव करने की प्रथा बैन होने के बाद रामनामियों की दशा कुछ सुधरी है.
राम टंडन बताते हैं कि 'नयी पीड़ी के रामनामी अपने पूरे शरीर पर राम नाम के टैटू बनवाने से थोड़ा बचते हैं. इसका मतलब ये नहीं कि उनमें श्रद्धा नहीं है. उन्हें काम और पढ़ाई के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता है और इसलिए शरीर के किसी भी अंग पर उन्हें राम नाम का टैटू बनवाना अनिवार्य है'.
रामनामी न ही मदिरा सेवन करते हैं न ही धूम्रपान. उन्हें हर दिन राम के नाम का जाप करना ज़रूरी है. हर प्राणी का आदर और सम्मान करना भी रामनामियों को सिखाया जाता है. किसी भी रामनामी के घर में आपको रामायण ज़रूर मिलेगी.
राम टंडन कहते हैं कि 'दुनिया बदल रही है, समय बदल रहा है. अब हमें एहसास हो रहा है कि हम सब एक ही हैं'.