इस लड़के की कहानी बताती है कि बलात्कार सिर्फ़ लड़कियों के साथ ही नहीं होता

रिश्तेदारों पर हम सभी हद से ज़्यादा भरोसा करते हैं, खासकर अपने चाचा, मामा आदि पर, लेकिन क्या इस तरह से उन पर विश्वास करना बिलकुल सही है? 
ये कहानी है एक रेप पीड़ित पुरुष की. जी हां, हैरान होने की ज़रूरत नहीं है. भले ही आज रेप शब्द सिर्फ़ महिलाओं के साथ जुड़ गया हो, लेकिन समाज में पुरुषों का भी रेप होता आया है. हम लोग ऐसी घटनाओं से इसलिए अंजान रहते हैं क्योंकि वो दबी रह जाती हैं. इस पीड़ित ने अपने दर्द की दास्तां को फेसबुक पेज ‘ह्यूमंस ऑफ बॉम्‍बे’ में लिखकर बयां किया है.


उसके साथ बलात्कार करने वाला और कोई नहीं बल्कि उसका चाचा था, जिसने 7 साल की उम्र में पहली बार तब उसका रेप किया, जब वो इसे नहला रहा था. और 18 साल की उम्र तक यह सिलसिला चलता रहा.
“उन्‍होंने कई बार मेरे साथ रेप किया. क्‍या ये ठीक था, यह सामान्‍य था. मैं नहीं जानता था कि मेरे साथ क्‍या हो रहा है? रेप के बाद मुझे बहुत दर्द होता था और खून भी निकलता था, लेकिन मैं चुप रहता था”.

रो कर करता था अपना दर्द कम 

“रेप के बाद मैं चुपचाप घर आकर बिस्‍तर पर लेट जाता था. इस तरह मैंने 11 साल तक घुट-घुटकर अपनी जिंदगी बिताई. उसने बताया कि यूं तो मैं अक्‍सर चुप ही रहता था, लेकिन घर में एक छोटी-सी बात पर भी मैं जी भरकर रो लेता था. शायद इसी तरह मैं अपने दर्द को कम करने की कोशिश कर रहा था”.

सार्वजनिक शौचालयों में जाने से घबराता था 

“12 साल की उम्र में मेरे चाचा ने अपने दोस्‍त के साथ मिलकर मेरा गैंगरेप किया. मुझे बहुत दर्द हो रहा था, लेकिन मैं फिर भी चुप था. पीड़ित ने लिखा है कि उसे पुरुषों के लिए बने सार्वजनिक शौचालयों में भी जाने से डर लगता था. उसे लगता था कि अगर वह बाथरूम जाएगा तो उसके साथ फिर से रेप होगा”.

11 साल में पहली बार किया अपने चाचा का विरोध 

उसे 17-18 साल की उम्र में समझ आया कि उसके साथ जो भी हो रहा है, वह सही नहीं है. वह नॉर्मल नहीं है. उसके साथ गलत किया जा रहा है. 11 साल में पहली बार उसने चाचा का विरोध किया और उन्‍हें लात मारकर ‘नहीं’ कहा.

दोस्त उड़ाते थे उसका मज़ाक 

पीड़ित ने लिखा है कि जब उसने बचपन में अपने दोस्तों से इस बात का ज़िक्र किया तो वे उसका मजाक बनाने लगें. वह सभी के उपहास का पात्र बन गया. उसे ये एहसास होने लगा कि वह ‘गे’ है. कानून का सहारा लेने की कोशिश की तो पता लगा कि लड़कों के ‘चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज़’ के लिए कोई कानून ही नहीं है.

अब लड़ रहा है दूसरों के अधिकारों की लड़ाई 

पीड़ित बचपन में अपनी मदद तो नहीं कर सका, लेकिन अब वह दूसरे बच्चों की मदद कर रहा है, ताकि वह बच्‍चों को इस तरह के अत्याचार से बचा सके. इतना ही नहीं, अब यह शख़्स न केवल बच्चों बल्कि महिलाओं और एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ रहा है.

मज़ाक उड़ाने वालों का शुक्रिया अदा किया 

इस शख़्स का कहना है कि "11 साल नरक जैसी ज़िंदगी जीने के बाद भी मुझे नहीं लगता है कि दुनिया बुरी है. मैं अपना मजाक उड़ाने वालों का शुक्रिया अदा करता हूं, क्‍योंकि मैं आज जहां हूं, उन्‍हीं की वजह से हूं. आज मुझे मौका मिला है कि मैं दूसरों की जिंदगी को संवार सकूं. नफ़रत केवल नफ़रत करने वाले को खत्‍म करती है. वह नफ़रत को खत्‍म नहीं करती. इसलिए मुझे लगता है कि मैं अपने चाचा से नफ़रत नहीं करता. वह मेरे लिए हैं ही नहीं. अगर मैं कर सकता तो अपने चाचा को मदद के लिए किसी डॉक्‍टर के पास भेजता. मैं नहीं चाहता कि मैं अपनी सारी ज़िंदगी उन्‍हें तकलीफ़ देने में गुज़ार दूं".

अपने लिए फैसले पर गर्व है 

"मेरे वो 11 साल वापस तो नहीं आ सकते, लेकिन मैं दूसरे बच्‍चों को इस दर्द से गुजरने से बचा सकता हूं. इसलिए मैं बच्‍चों और एलजीबीटी समुदाय के लिए काम कर रहा हूं और मुझे खुद पर गर्व है कि मैंने यह रास्‍ता चुना है".

भारत में पुरुषों के साथ रेप की खबरें कम ही दिखाई जाती हैं. इसके दोषियों को सजा देने के लिए कोई कानून भी नहीं बना है. भारतीय दंड संहिता की धारा 375 पुरुषों को रेप का पीड़ित मानती ही नहीं है. पुरुष सिर्फ़ धारा 377 से न्याय की उम्मीद कर सकते है जो देश में अभी विवाद का विषय है.
Source: TOI

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