
कहने
के साथ-साथ करना और व्यावाहरिक होना बड़ा ही मुश्किल है. वास्तविकता ये है
कि कथन के बाद जब उसे स्वयं पर लागू करने की बात आती है, तो बहुतेरे
बुद्धिजीवी फिसड्डी साबित होते हैं. 'ईमानदारी ही सफलता की कुंजी है', ये
विचार सफ़लता के कठीन और स्वयं-संतुष्टी से उपजा हुआ है, क्योंकि ग़र गलती
से आप इस भ्रष्ट व्यवस्था में ईमानदार निकल गये तो ये सिस्टम परेशान होने
लगता है और आपको परेशान करने लगता है.
हालांकि, ईमानदार लोगों को सिस्टम की परवाह नहीं होती वो किसी भी कीमत
पर अपना काम करना चाहते हैं. ऐसी ही कुछ ईमानदार मिसालें देश की
सर्वक्षेष्ठ एवं प्रतिष्ठित सेवा, 'भारतीय प्रशासनिक सेवा' में देखने को
मिलती हैं. हमारा ये कहना कतई नहीं है कि बाक़ी अधिकारी अपने काम के प्रति
सचेत नहीं हैं लेकिन ये ज़रूर कहना है कि इन मिसालों को अपनी ईमानदारी की
कीमत भी चुकानी पड़ी है.
1. अशोक खेमका
बीते सालों खेमका सुर्खियों में रहे थे, वजह ईमानदारी थी. अशोक खेमका
अपने 21 साल के करियर में लगभग 40 बार ट्रांसफर हो चुके हैं. कई बार इन्हें
मौत की धमकी मिली लेकिन फ़िर भी अपने काम करने के क़ानूनी तरीके को
इन्होंने किसी के दबाव में नहीं बदला. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री
ओमप्रकाश चौटाला की सरकार के दौरान खेमका का पांच साल में नौ बार तबादला
हुआ था. सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए खेमका
जाने जाते हैं.राबर्ट वाड्रा से जुड़े जमीन विवाद को उजागर करने के मामले
को लेकर खेमका चर्चित रहे थे. इनकी ईमारदारी का तोहफ़ा यही है कि तबादले
इनकी झोली में डलते चले जा रहे हैं.
2. दुर्गा शक्ति नागपाल
दुर्गा शक्ति को यमुना नदी के किनारे गैर क़ानून तरीके से होते खनन के
खिलाफ़ आवाज़ उठाने के चलते निलंबित कर दिया गया था. दुर्गा पर ये आरोप
लगाया गया कि इलाके में एक मस्जिद की दीवार गिराने के चलते सांप्रदायिक
तनाव बढ़ गया जबकि उन दिनों इस प्रकार की कोई घटना नहीं हुई थी. इसके बाद
दुर्गा के पति जो मथुरा के एसडीएम हैं, उन्हें भी सस्पेंड कर दिया गया.
मीडिया में बढ़ते आक्रोश के कारण राज्य सरकार ने दुर्गा के मामले पर विचार
करने की ठानी. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दुर्गा से व्यक्तिगत रूप से
मिलकर उनका पक्ष सुना एवं गहनता से विचार करने के बाद दुर्गा को बहाल कर
दिया.
3. डीके रवि
भू-माफिया से सीधे टक्कर लेने वाले प्रशासनिक अधिकारी डीके रवि का शव
उनके सरकारी आवास में पंखे से लटका मिला था. कोलार जिले में उपायुक्त रहते
वक़्त रवि रेत माफ़ियाओं से सीधे-सीधे टक्कर ले बैठे थे. बाद में हालांकि
उनका तबादला भी कर दिया गया था जिसपर स्थानीय लोगों ने काफ़ी विरोध जताया.
उनके साथ काम करने वाले अधिकारियों का कहना है कि, डीके रवि जैसे अधिकारी
आत्महत्या कर ही नहीं सकते.
4. शणमुघन मंजूनाथ
2005 में IOC के सेल्स अधिकारी मंजूनाथ की हत्या तेल माफ़िया द्वारा कर
दी गई. गौर करें कि मंजूनाथ ने खीरी में मिलावटी पेट्रोल मिलाने वाले एक
पेट्रोलपंप का लाईसेंस रद्द कर दिया था. सीतापूर के महोली के पास मंजूनाथ
की लाश उनकी ही कार में मिली थी.
5. यशवंत सोनावणे
मंजूनाथ की तरह यशंवत को भी ईमानदारी की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी. 25
जनवरी 2011 को मानमाड के तेल माफियाओं के खिलाफ़ कारवाई करने वाले यशवंत को
ज़िंदा जलाकर मार डाला. यशवंत इस इलाके के एडिश्नल कलेक्टर थे.
6. डॉ. समित शर्मा
डॉ. समित शर्मा राजस्थान के युवा आईएएस अधिकारी हैं. समित ने अपने एक
कारनामे से साबित कर दिया कि प्रशासन की सबसे मज़बूत कड़ी जिला कलक्टर होता
है. नागौर जिले में उनकी उपलब्धियां जग-जाहिर हैं. जब इनका तबादला किया
गया तो लोग इसके खिलाफ़ सड़कों पर उतर आये. इससे पहले भी कई जगहें इनके
पक्ष में लोग सामने आते रहे हैं. शर्मा अपने काम करने के अलग-अलग तरीकों की
वजह से जाने जाते हैं. वो रात को अस्पताल में जाकर सुविधाओं को जायजा लेते
रहे हैं. इस अदद प्रयास और परिश्रम के बाद भी प्रशासन उन्हें मात्र तबादले
की सौगात देता है.
7. मुग्धा सिन्हा
राजस्थान के झुंझनु जिले की पहली महिला कलेक्टर हैं मुग्धा सिन्हा.
स्थानीय माफ़ियाओं के खिलाफ़ कड़ा विरोध प्रकट करने वाली मुग्धा का तबादला
कर दिया गया. लोग मुग्धा के काम से खुश थे और उनके सर्मथन में उतरे. इसके
बाद मुग्धा का तबादला श्रीगंगानगर कर दिया गया. उनका कहना है कि, “उन्हें
मात्र अपने काम से मतलब है."
8. सत्येन्द्र दूबे
NHAI में प्रोजेक्ट मनेजर के रूप में कार्य कर रहे सत्येन्द्र दूबे की
हत्या गया जिले में कर दी गई थी. दूबे जी भारतीय अभियांत्रिकी सेवा में
कार्यरत थे. स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के तहत जब उन्हें कार्य करने का
मौका मिला तो इस परियोजना में हो रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने से
भी वो पीछे नहीं हटे. उनकी ईमानदारी से नाराज़ लोगों ने उन्हें मौत के घाट
उतार दिया.