बाजीराव-काशीबाई के प्यार का गढ़ ‘शनिवार वाड़ा’, आज है पुणे का सबसे खौफ़नाक किला

एक समय था जब मराठा साम्राज्य का परचम हर जगह लहरा रहा था. पेशवा बाजीराव, शिवाजी, नाना साहेब ने दुनिया भर में मराठा योद्धाओं का नाम रोशन किया था. लेकिन इतने शूर-वीर साम्राज्य को जब ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों शिकस्त खानी पड़ी तो एक-एक कर पूरा मराठा राज शिथिल हो गया.

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इंटरनेट पर मौजूद जानकारी के अनुसार, किसी समय बाजीराव पेशवा की शान, उनका घर 'शनिवार वाड़ा', आज के समय भूतों का घर बन चुका है और पुणे के सबसे Haunted जगहों में से एक है.
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इस घर के मनहूसपने की शुरुवात हुई बाजीराव और उनकी पत्नी काशी बाई के टूटते संबंधों के साथ. दो साल की कड़ी मेहनत के बाद जो घर बनना चाहिए था मराठा सम्प्रदाय को और ताकत देने के लिए, उसमें शोक के ऐसी शुरुआत हुई कि कभी नहीं थमी. पहले बाजीराव काशी बाई से अलग हुए और मस्तानी के प्यार में पड़ गए. लेकिन वो कहानी भी पूरी नहीं हुई. और उसके बाद उन्हें खुद के ही बेटे के हाथों विश्वासघात देखना पड़ा, जिसके बाद उनकी दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु हो गयी.
लेकिन 'शनिवार वाङा' में इसके बाद भी मौत का ख़ूनी-खेल खत्म नहीं हुआ. इसके बाद भी इस जगह ने कई मौतें और परिवार में विद्रोह देखा. बाजीराव के बाद जो कोई भी सत्ता पर बैठा, उसकी मौत हत्या, साजिश और ख़राब तबियत की वजह से हुई. ऐसा लग रहा था, जैसा 'शनिवार वाड़ा' किसी का दिया हुआ कठोर श्राप भुगत रहा था.
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बाजीराव के पोते नारायणराव और विश्वासराव के अपने पिता और दादा की मौत के बाद जब सिंघासन संभाला, तो ये उनके चाचा और चाची को पसंद न आया. उन दोनों ने मिलकर सबकी हत्या का ऐसा षड्यंत्र रचा, कि इनका पूरी रॉयल फैमिली एक-एक करके ख़ाक हो गयी.

हिन्दू धर्म के अनुसार, मरे हुए आदमी का पूरा संस्कार किया जाना चाहिए ताकि उसे मुक्ति मिल सके. लेकिन कहते हैं कि नारायणराव का अंतिम-संस्कार कभी नहीं हुआ. कहते हैं 'शनिवार वाड़ा' में अभी भी नारायण राव की आत्मा भटकती है.
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किसका श्राप था शनिवार वाड़ा पर

कहते हैं, काशी-बाई की दोस्त जिसका पति मराठा सेना में था. बाजीराव ने उसे गद्दार कह कर मरवा दिया था. जिसके बाद काशी-बाई ने उन्हें श्राप दिया था, कि ये जगह कभी भी फल-फूल नहीं सकती.
ये जो कुछ भी हुआ, उसके बावजूद लोग शनिवार वाड़ा को शापित मानने से इंकार करते रहे. 27 फरवरी, 1828 में इस महल में ऐसी आग लगी कि सब ख़ाक हो गया. बस किले का गेट और उसकी बुनियाद रह गयी.
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इतने सब के बाद भी अगर आपके अंदर साहस है, यहां जाने का, तो दोबारा बता रहे हैं कि ये पुणे की सबसे भयावह जगह है. कुछ दिलेर इसे नज़रअंदाज़ करते हुए आगे बढ़ना चाहें तो, आज के समय में कुछ टूरिस्ट्स को किले के बाहरी छोर तक जाने दिया जाता है, लेकिन रात में ये जगह इतनी सुनसान हो जाती है कि यहां सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ें आती हैं.
लोकल और कुछ-एक दिलेर यात्री, इस किले के पास कैंप भी लगाते हैं, ताकि वो ज़ोर-ज़ोर से चिलाने की आवाज़ें सुनें. किसकी? नारायणराव की आत्मा की.
'काका! मुझे बचाओ!'.... ये वो आवाज़ है, जो शनिवार वाड़ा का पीछा आज भी नहीं छोड़ती.
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